विकास और आधुनिकता के दंभ भरे दावों के बीच हमीरपुर जिले की नादौन विधानसभा का एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। यह सच है सनाही पंचायत के देशराज और उनके परिवार का, जो 21वीं सदी में होने के बावजूद 1990 के दशक की जर्जर स्थितियों में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। यहाँ विकास के सारे दावे बेनूर होकर रह जाते हैं।
मुख्यमंत्री के अपने गृह क्षेत्र की यह तस्वीर प्रशासनिक व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को बयां करती है। देशराज का परिवार आज भी उन मूलभूत सुविधाओं से वंचित है, जो किसी भी नागरिक का सबसे प्राथमिक अधिकार है।
*ऐसी है दयनीय स्थिति:*
परिवार के पास न तो पक्की सड़क का रास्ता है और न ही आवास योजना का कोई लाभ। उनकी दशा इतनी शोचनीय है कि उनका मकान पहले ही ढह चुका है और जो एक कमरा बचा है, वह भी अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। उसकी दीवारों में बांस के सहारे (स्पोट) लगाकर उसे मात्र खड़ा रखा गया है, जो किसी भी पल गिर सकता है और परिवार की जान ले सकता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसी खतरनाक माहौल में रहने को अभिशप्त हैं।
*प्रशासन बना रहा उदासीन:*
देशराज ने इस संकट की जानकारी बार-बार पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर नादौन के उपमंडल अधिकारी (SDM) तक को दी है। लेकिन ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह से फेल साबित हुई है, जिसने इस परिवार की पीड़ा और मदद की गुहार को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।
*सवाल करती है राजनीतिक विडंबना:*
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह घटना उसी नादौन विधानसभा की है, जिसे प्रदेश के मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है। जिस जनता के वोट और विश्वास ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया, आज उन्हीं की सबसे बुनियादी समस्याओं से प्रशासन अनजान बना हुआ है।
एक सवाल यह भी उठता है कि जब मुख्यमंत्री के अपने गृहक्षेत्र में एक परिवार का यह हाल है, तो पूरे प्रदेश में विकास की क्या स्थिति होगी? यह मामला सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के दावों पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या विकास की रोशनी सचमुच हर घर तक पहुंच पाई है, या फिर यह सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही सीमित है?
