मंडी से उठा ताजा विवाद महज़ एक प्रोटोकॉल चूक नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक अहंकार का प्रतीक है, जो अब खुलेआम निर्वाचित मंत्रियों को चुनौती देने लगा है। आयुष, युवा सेवाएं एवं खेल तथा कानून मंत्री यादविंदर गोमा द्वारा मंडी के उपायुक्त अपूर्व देवगन पर लगाया गया आरोप सीधा-सीधा सिस्टम की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
गणतंत्र दिवस से पहले अपमान—संयोग या संदेश?
26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व से ठीक पहले एक कैबिनेट मंत्री का जिले में आगमन और उपायुक्त का नदारद रहना—क्या यह केवल “व्यस्तता” थी या फिर जानबूझकर दिखाई गई संस्थागत बेरुख़ी?
सरकारी प्रोटोकॉल कोई सजावटी किताब नहीं है। वह इसलिए बना है ताकि संवैधानिक पदों की गरिमा बनी रहे। जब एक मंत्री को रिसीव करने तक की जहमत नहीं उठाई जाती, तो सवाल उठता है— क्या अब अफसर तय करेंगे कि किस मंत्री को कितना सम्मान मिलना चाहिए?
विशेषाधिकार हनन: चेतावनी या आख़िरी हथियार?
यादविंदर गोमा का विधानसभा अध्यक्ष को विशेषाधिकार हनन का नोटिस देना मामूली कदम नहीं है। यह साफ संकेत है कि अब मंत्री भी चुप बैठने को तैयार नहीं हैं।
यह मामला सिर्फ एक DC से जवाब-तलब तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह तय होना चाहिए कि— अगर आज एक मंत्री के साथ ऐसा हुआ है, तो कल किसी विधायक या सांसद की बारी क्यों नहीं?
विक्रमादित्य सिंह से गोमा तक—टकराव की कड़ी
यह विवाद हवा में पैदा नहीं हुआ। कुछ ही दिन पहले लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने IAS और IPS अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाकर सिस्टम को झकझोर दिया था।
उनकी टिप्पणी पर अफसरशाही का संगठित प्रतिरोध, मुख्यमंत्री से शिकायतें और अब गोमा का नोटिस—यह सब मिलकर एक ही कहानी कहता है:
👉 अफसरशाही असहज है क्योंकि उससे सवाल पूछे जा रहे हैं।
👉 और मंत्री नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री की भूमिका कहां है?
जब मंत्रियों और अधिकारियों के बीच टकराव सड़कों से निकलकर विधानसभा तक पहुंच जाए, तो मुख्यमंत्री की चुप्पी भी सवालों के घेरे में आती है।
क्या सरकार अपने ही मंत्रियों की गरिमा की रक्षा कर पाएगी?
या फिर यह संदेश जाएगा कि अफसरशाही सर्वोच्च है और जनादेश गौण?
यह लड़ाई सिर्फ गोमा की नहीं
यह लड़ाई सिर्फ यादविंदर गोमा बनाम अपूर्व देवगन नहीं है।
यह लड़ाई है—
जनमत बनाम नियुक्ति
जवाबदेही बनाम अहंकार
लोकतंत्र बनाम लालफीताशाही
अगर इस मामले में स्पष्ट और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह तय है कि हिमाचल में प्रशासनिक अनुशासन नहीं, प्रशासनिक मनमानी आगे का रास्ता तय करेगी।
और तब जनता यही पूछेगी—
वोट हमने दिया था, लेकिन सरकार चला कौन रहा है?
