देवभूमि हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे हैं। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में काम कर रही सरकार पर आरोप है कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को संरक्षण देने के बजाय उन्हें बार-बार तबादलों की मार झेलनी पड़ रही है।
इसी कड़ी में SDM राजेंद्र गौतम का नाम चर्चा में है, जिनकी कार्यशैली को लेकर आम जनता में सराहना है, लेकिन लगातार हो रहे उनके तबादले कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि हाल ही में उन्होंने घरेलू गैस के दुरुपयोग के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए एक ही दुकान से 9 सिलेंडर पकड़े थे। यह कार्रवाई बाजार में चल रही अनियमितताओं पर सीधा प्रहार मानी जा रही थी, लेकिन कार्रवाई के महज चार दिन बाद ही उनका तबादला कर दिया गया।
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले उपमंडल बड़सर में भी उन्होंने बाजार निरीक्षण कर अव्यवस्थाओं को सुधारने की कोशिश की थी, लेकिन दिसंबर में उन्हें वहां से भी हटा दिया गया।
सूत्रों की मानें तो जहां-जहां उन्होंने सुधारात्मक कदम उठाए, वहां-वहां राजनीतिक दबाव के चलते उनके तबादले कर दिए गए। बाबा बालक नाथ मंदिर न्यास में व्यवस्थाओं को सुधारने का प्रयास भी कुछ लोगों को रास नहीं आया।
लगातार तबादलों से यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रदेश में ईमानदारी से काम करना ही अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी सजा बनता जा रहा है?
प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों को बिना स्थायित्व के काम करना पड़ रहा है, जिससे न केवल उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है बल्कि आम जनता को मिलने वाली सेवाओं पर भी असर पड़ रहा है।
सोशल मीडिया और विभिन्न समाचार माध्यमों में भी इस मुद्दे ने जोर पकड़ लिया है। लोग खुलकर कह रहे हैं कि अगर ईमानदार अधिकारियों को ही इस तरह हटाया जाएगा, तो व्यवस्था में सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार ईमानदारी को बढ़ावा देगी या फिर तबादलों की राजनीति यूं ही जारी रहेगी?
