मुक्त व्यापार के नाम पर कृषि, डेयरी, मछली पालन में कोई असमान समझौते नहीं

अखिल भारतीय किसान सभा देश भर में अपनी सभी इकाइयों से आह्वान करता है कि वे 21 अप्रैल 2025 को जब द्विपक्षीय व्यापार सौदे पर बातचीत के लिए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस भारत आयेगे तब गांवों और जिला मुख्यालयों में “वैंस वापस जाओ! भारत बिकाऊ नहीं है” के नारे के साथ प्रदर्शन करें और पुतला जलाएं।

 

भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हुक्म के आगे घुटने टेक दिए हैं और कृषि उत्पादों सहित अमेरिकी उत्पादों के लिए टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने जोर देकर कहा कि भारत को अपना कृषि बाजार खोलना चाहिए और द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत में कृषि को ‘बाहर’ नहीं रखा जा सकता।

 

द्विपक्षीय व्यापार समझौता के तहत चर्चा पशुपालक किसानों के लिए मौत की घंटी होगी क्योंकि टैरिफ और बाजार प्रतिबंध हटाए जाने पर भारत को अमेरिकी डेयरी निर्यात में भारी उछाल आएगा। अमरीकी गेहूं संघ का दावा है कि भारत में घरेलू समर्थन का उच्च स्तर है और व्यापार को विकृत करने वाले उच्च टैरिफ हैं; विडंबना यह है कि यह तब है जब भारत में किसान कानूनी रूप से गारंटीकृत खरीद के साथ लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह, मक्का के मामले में, आनुवंशिक रूप से संशोधित मक्का के साथ-साथ इथेनॉल पर भारत के आयात प्रतिबंध को हटाने के लिए दबाव है, जिससे अमेरिका को अप्रत्याशित लाभ होने की उम्मीद है। सोयाबीन, बादाम, पिस्ता, अखरोट, सेब और बागवानी की फसलें सभी अमेरिका स्थित कमोडिटी कार्टेल के इशारे पर बातचीत के लिए तैयार हैं। जबकि भारतीय कपास किसान पहले से ही गंभीर संकट में हैं और आत्महत्या कर रहे हैं और 2017-18 में 3.7 करोड़ गांठ (प्रत्येक 170 किलोग्राम) से 2022-23 में 3.47 करोड़ गांठ तक वार्षिक कपास उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है और 2023-24 में इसके 3.16 करोड़ गांठ तक गिरावट का अनुमान है, टैरिफ वापस लेने के लिए बातचीत का बढ़ना बेहद असंवेदनशील है।

 

समाचार रिपोर्टों के अनुसार 2030 तक मिशन 500 के तहत, कुल व्यापार को दोगुना करके 500 बिलियन डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है। चल रही व्यापार वार्ता एक जानबूझकर की गई चाल है ताकि अमेरिका से सस्ता कपास, सोयाबीन, मक्का, सेब आदि भारत में डंप किया जा सके, जिससे बाजार में भारी गिरावट आएगी। इससे भारतीय किसानों के लिए कीमतों में भारी गिरावट आएगी। सभी वार्ताएं राज्य सरकारों या संसद को विश्वास में लिए बिना की जा रही हैं। ऐसे समझौते अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों के क्रियान्वयन का आश्वासन भी नहीं देते।

 

जबकि चीन, कनाडा, मैक्सिको आदि देशों ने ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ तीखा प्रतिरोध किया और अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एकजुट हुए है, वहीं भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को त्यागने का विकल्प चुना है। उल्लेखनीय है कि कनाडा और मैक्सिको, जो अमेरिका को 70 प्रतिशत से अधिक निर्यात करते हैं, ने पलटवार करने से पहले पलक झपकाने बराबर समय नहीं लिया, जबकि अमेरिका को लगभग 18 प्रतिशत निर्यात करने वाला भारत अमेरिका दबाव की राजनीति के खिलाफ खड़ा होने से इनकार कर रहा है। कृषि के अलावा, जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स से लेकर ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में एमएसएमई और इन क्षेत्रों के लाखों श्रमिकों के हितों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है।

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस की भारत यात्रा भारत सरकार और कॉरपोरेट नेतृत्व वाले शासक वर्गों पर दबाव डालने का एक हिस्सा है, वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अप्रत्याशित मुनाफाखोरी की सुविधा देने के लिए राष्ट्रीय हितों को त्याग रहे है। इस संदर्भ में किसान सभा प्रतिरोध के प्रतिक के रूप में उभर कर आएगी और किसानों व खेत मजदूरों को एकजुट हो विरोध करने और ‘जे.डी.वेंस वापस जाओ! भारत बिकाऊ नहीं है!’ का नारा लगाने आह्वान करती है

 

अखिल भारतीय किसान सभा और *हिमाचल किसान सभा* अपनी सभी इकाइयों से भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने पूरी तरह से आत्मसमर्पण के खिलाफ व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान करती है।

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Author: powan dhiman

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