हिमाचल प्रदेश ( प्रकाश चन्द शर्मा)ये बातें सिर्फ पेंशन या यात्रा के संदर्भ में नहीं हैं, बल्कि जीवन के हर जरूरी क्षेत्र में लागू हैं। स्वास्थ्य एक ऐसा ही क्षेत्र है जिसके बारे में सरकार खूब प्रचार कर रही है। सरकार यह कहने से नहीं चूकती कि पांच लाख तक के इलाज की व्यवस्था कर दी गई है। अब किसी को ये सोचने की जरूरत नहीं है कि पैसे के बिना उसका इलाज कैसे होगा? आयुष्मान कार्ड सबका बना दिया गया है। लेकिन सच्चाई क्या है ? आयुष्मान कार्ड की अपनी बहुत सारी शर्तें हैं। वह आधार ऐसा बना दिया गया है कि उसी में अस्सी प्रतिशत लोग छंट जाते हैं। बाकी जो बचते हैं उनमें भी दस प्रतिशत लोगों का भी आयुष्मान कार्ड नहीं बना है। अगर कार्ड बन भी गया है तो बहुत से अस्पताल उसे स्वीकार ही नहीं करते हैं। सरकारी अस्पतालों की हालत ये है कि वहां मरीजों को देखने के लिए पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों का तो घोर अभाव है। सरकार जितना वेतन दे रही है उस वेतन पर आने के लिए नए विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार ही नहीं हैं। शायद ही कोई अस्पताल हो जहां शत प्रतिशत डॉक्टरों के पद भरे हों। मरीजों के परीक्षण की या तो मशीनें नहीं हैं या अगर हैं तो उन्हें चलाने वाले योग्य कर्मी नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों में दवा भी सिर्फ खांसी-जुकाम की ही मिलती है। डॉक्टर मरीज से खुद पूछ लेते हैं कि अगर बाहर से दवा खरीद सकते हो तो कहो लिख दें क्योंकि यहां ये दवा नहीं है। मरीज क्या कहेगा। बाहर से दवा लेने के लिए हामी भर देता है।
