एनएच-03 निर्माण: ठेकेदार की मनमानी से गांव वालों में आक्रोश, दो मकान गिरने के कगार पर!

पवन धीमान, हमीरपुर*

राष्ट्रीय राजमार्ग-03 के चौड़ीकरण का काम ग्रामीणों के लिए वरदान नहीं, बल्कि एक अभिशाप बनता जा रहा है। निर्माण कार्यों में लगी कंपनी की लापरवाही और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते झनिककर गांव के निवासी आज अपने ही घरों में डर के साये में जीने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी पुकार सुनने के बजाय उनके चुने हुए प्रतिनिधि और अधिकारी कंपनी की ‘गर्म जेब’ का शिकार होकर खामोश हैं।

टोनी देवी कस्बे के नजदीक झनिककर गांव के निवासियों की व्यथा-कथा सुनकर कोई भी द्रवित हो उठेगा। लगातार हो रही बारिश ने उनकी मुसीबतों पर मानो मानो पानी फेर दिया है। कंपनी द्वारा लगाए गए एक डंगे (मलबे के ढेर) की वजह से दो आवासीय मकान पूरी तरह से ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं। इन घरों में रहने वाले परिवारों का जीवन खतरे में है, और पूरा गांव उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

*”हमें किसे सुनाएं अपना दुखड़ा?”*

एक प्रभावित निवासी का कहना है, “साहब, हमारी कोई नहीं सुनता। विकास के नाम पर हमने जिन प्रतिनिधियों को वोट देकर भेजा, वे आज सबसे ज्यादा खामोश हैं। उनके पास जाएं तो वे महज खोखले आश्वासन देकर टाल देते हैं। ऐसा लगता है कंपनी ने सबकी जेबें गर्म कर दी हैं और हमें बरसात और सर्दी में तड़पने के लिए छोड़ दिया है।”

*”हम करेंगे बड़ा आंदोलन!”*

इस मामले में आक्रोश इतना गहरा है कि अब ग्रामीणों ने आंदोलन की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। एनएच-03 प्रभावित पीड़ित मंच की अध्यक्ष रीना चौहान ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, “राजमार्ग कंपनी के अधिकारी तो भ्रष्ट हैं ही, लेकिन छोटे से लेकर बड़े प्रतिनिधि, प्रशासन और प्राधिकरण के अधिकारी भी तमाशबीन बने हुए हैं। इसकी पूरी जिम्मेदारी कंपनी की है। अगर जल्द ही कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो हम एक बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।”

गौरतलब है कि पीड़ित मंच द्वारा इससे पहले भी कई बार विरोध प्रदर्शन और घेराव किया जा चुका है, लेकिन हर बार प्रशासनिक स्तर पर उनकी समस्याओं की अनदेखी की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि स्वयं इस पूंजीबल के आगे बेबस और लाचार नजर आते हैं।

सवाल यह है कि क्या ‘विकास’ की अंधी दौड़ में आम आदमी की सुरक्षा और उसके अधिकारों की कुर्बानी जायज है? ग्रामीणों की इस पीड़ा को सुनने और उन्हें न्याय दिलाने की जिम्मेदारी अब सीधे तौर पर उच्चस्तरीय प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग कर रही है।

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Author: powan dhiman

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