एनएच-03 का यह पुराना विवाद प्रशासनिक आदेशों से जमीन पर कितनी जल्दी सुलझता है, या फिर यह मामला यूँ ही फाइलों में घूमता

अप्पर दरोगण क्षेत्र में अनुसूचित जाति से जुड़े सात परिवारों के सामने पैदा हुआ रास्ते का संकट अब प्रशासनिक संवेदनहीनता और कानून-व्यवस्था की विफलता पर बड़ा सवाल बन गया है। पीड़ित परिवारों ने उपायुक्त हमीरपुर से मिलकर न्याय की गुहार लगाई, लेकिन सवाल यह है कि जब समस्या जानलेवा बन चुकी है, तब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
ग्रामीणों का कहना है कि उनका करीब 200 वर्ष पुराना पारंपरिक रास्ता, जो अप्पर दरोगण से दरकोटी को जोड़ता था, राष्ट्रीय राजमार्ग-03 के निर्माण के दौरान तोड़ दिया गया। एनएच कंपनी द्वारा वैकल्पिक रास्ता देने का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन जैसे ही निर्माण कार्य शुरू हुआ, दरकोटी गांव के कुछ लोगों ने दबंगई दिखाते हुए काम रुकवा दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या किसी भी व्यक्ति या समूह को सार्वजनिक और पारंपरिक रास्ता बंद करने का अधिकार है?
जब रास्ते में कांटेदार झाड़ियां और पत्थर रखे गए, तब प्रशासन और पुलिस कहां थी?
क्या अनुसूचित जाति के सात परिवारों के अधिकार इतने कमजोर हैं कि उन्हें यूं ही नजरअंदाज किया जा सकता है?


इस रास्ते से रोज़ाना स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे गुजरते हैं, जिनके गिरने और घायल होने का खतरा बना हुआ है। वहीं, गांव के नेक राम पुत्र लक्ष्मण राम, जिनका शुगर के कारण एक पैर कट चुका है, उनके लिए आवाजाही लगभग असंभव हो चुकी है। क्या किसी अनहोनी के बाद ही प्रशासन जागेगा?
चौंकाने वाली बात यह भी है कि इसी रास्ते से पेयजल टैंक, बिजली विभाग का ट्रांसफार्मर और एयरटेल मोबाइल टावर तक पहुंच होती है।
अगर आपात स्थिति में बिजली या पानी की सप्लाई बाधित होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
पीड़ित परिवारों के घर में 15 फरवरी को पारिवारिक कार्यक्रम है, लेकिन रास्ता बंद होने से रिश्तेदारों का पहुंचना मुश्किल हो गया है।
क्या प्रशासन तब भी इंतजार करेगा जब सामाजिक और मानवीय संकट और गहराएगा?
अब सवाल साफ है—
क्या जिला प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है?
या फिर
तुरंत मौके पर जाकर रास्ता बहाल कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी?
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र रास्ता नहीं खुलवाया गया, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और संबंधित विभागों की होगी।
गांव वासी इस समस्या के संदर्भ में उपयुक्त हमीरपुर से दो बार मिल चुके हैं अब देखना है कि जिला प्रशासन इस बारे कोई ठोस कदम उठाता है या फिर मुख दर्शक बनकर किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार करेगा। निर्माण अधीन कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों की दबंगई से पहले ही यह लोग बेहद परेशान है और जब उन्होंने शांतिपूर्वक अपने आंखों की लड़ाई लड़ने का प्रयास किया तो कथित पुलिस प्रशासन द्वारा भी उनके साथ न देकर कंपनी के हितों की पैरवी की गईं। हालांकि सुजानपुर के पूर्व विधायक और प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्ता राजेंद्र राणा इन लोगों के हकों को लेकर खुले तौर पर निर्माण अधीन कंपनी, एनएचएआई. और पुलिस पर भी बरसे हैं।

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Author: powan dhiman

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