हमीरपुर बस स्टैंड के पास लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के कटघरे में नहीं, बल्कि सीधे कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। फुटपाथ पर की गई आधी-अधूरी खुदाई अब विभागीय लापरवाही की खुली मिसाल बन चुकी है—जहां आम जनता की सुरक्षा से ज्यादा “काम शुरू दिखाना” प्राथमिकता लग रहा है।
स्थानीय व्यापारियों और राहगीरों में भारी रोष है। उनका साफ कहना है कि अगर काम करना था, तो पूरा क्यों नहीं किया गया? फुटपाथ पर गहरा गड्ढा खोदकर उसे यूं ही छोड़ देना क्या किसी दुर्घटना को न्योता देना नहीं है? क्या विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
सूत्रों की मानें तो संबंधित ठेकेदार ने यह काम इसलिए अधूरा छोड़ दिया क्योंकि उसे दूसरी जगह “समय पर पेमेंट” मिल रही है। यानी जहां पैसा समय पर, वहां काम पूरा—और जहां भुगतान अटका, वहां जनता भगवान भरोसे! यह स्थिति सीधे-सीधे विभागीय व्यवस्था की पोल खोलती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ठेकेदारों पर इतनी निर्भरता क्यों? क्या विभाग के पास खुद के संसाधन और क्षमता नहीं बची? खुदाई करने में तो तेजी दिखाई जाती है, लेकिन जब उसे पूरा करने की बारी आती है, तो “टेंडर”, “प्रक्रिया” और “मजदूरों की छुट्टी” जैसे बहाने सामने आ जाते हैं।
मामला यहीं नहीं रुकता। बस स्टैंड से कुछ ही दूरी पर नाली निर्माण का काम भी अधर में लटका हुआ है। हाल ही में हुई बारिश में गंदा पानी एक निजी बैंक में घुस गया—तब विभाग ने हड़बड़ी में खुदाई तो कर दी, लेकिन अब काम ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
अधिकारियों का कहना है कि मजदूरों की छुट्टी के कारण काम रुका है और नाली का ठेका अभी तक आवंटित नहीं हुआ। लेकिन सवाल यह है कि क्या योजनाएं बिना तैयारी के शुरू की जाती हैं? क्या पहले ठेका, मजदूर और संसाधन सुनिश्चित नहीं होने चाहिए थे?
सच तो यह है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की आदत बन चुकी है। हर बार की तरह इस बार भी जनता को जोखिम में डालकर काम अधूरा छोड़ दिया गया है।
अब देखना यह है कि विभाग जागता है या फिर किसी अनहोनी के बाद वही पुराना रटा-रटाया बयान—“जांच के आदेश दे दिए गए हैं”—सुनने को मिलेगा।
