शिक्षा का गढ़ माने जाने वाले हमीरपुर में अब किताबों की कीमतों को लेकर सियासत और संग्राम दोनों तेज हो गए हैं। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के नए “फॉर्मूले” ने अभिभावकों और स्कूल संचालकों के बीच हलचल मचा दी है। आरोप है कि बोर्ड ने किताबों के दाम इस कदर बढ़ा दिए हैं कि अब पढ़ाई नहीं, “महंगी पढ़ाई” चर्चा का विषय बन गई है।
सूत्रों की मानें तो पहली से छठी कक्षा तक की किताबों में भारी उछाल आया है। जहां NCERT की किताब ₹65 के आसपास मिलती है, वहीं एचपी बोर्ड की वही किताब ₹83 से ₹104 तक बेची जा रही है। यानी हर किताब पर 20 से 25 रुपये का “एक्स्ट्रा बोझ”—और यही बोझ अब हजारों परिवारों की जेब पर भारी पड़ रहा है।
“किताब वही, दाम नए—खेल क्या है?”
बुक सेलर्स खुलकर सवाल उठा रहे हैं—“जब कंटेंट में कोई बड़ा फर्क नहीं, तो कीमतों में इतना अंतर क्यों?” उनका दावा है कि यह सिर्फ “ब्रांड बदलने” का खेल है, जिसमें सीधा नुकसान आम आदमी का हो रहा है।
स्कूलों पर दबाव या धमकी?
निजी स्कूल संचालकों का आरोप और भी गंभीर है। उनका कहना है कि बोर्ड की ओर से साफ संदेश दिया गया है—“सिर्फ एचपी बोर्ड की किताबें लगाओ, वरना मान्यता खतरे में!”
अब सवाल उठता है—क्या यह शिक्षा सुधार है या फिर दबाव की राजनीति?
अभिभावकों का फूटा गुस्सा
माता-पिता का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है। उनका कहना है—“पहले निजी स्कूलों को दोष देते थे, अब खुद सरकारी बोर्ड ही महंगाई का रिकॉर्ड तोड़ रहा है!”
कई अभिभावकों ने इसे “सीधा आर्थिक शोषण” करार देते हुए सरकार से तुरंत दखल देने की मांग की है।
बड़ा सवाल:
क्या यह फैसला शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए है या फिर किसी “बड़े खेल” की आहट?
क्या सरकार अभिभावकों की जेब का दर्द समझेगी या फिर किताबों की कीमतों में यह आग यूं ही जलती रहेगी?
फिलहाल, हमीरपुर से उठी यह चिंगारी अब पूरे हिमाचल में भड़कती नजर आ रही है… और शिक्षा के मंदिर में उठ रहे ये सवाल अब जवाब मांग रहे हैं!
