हमीरपुर। शहर को आधुनिक स्वरूप देने के लिए प्रस्तावित सिटी सेंटर परियोजना ने जहां विकास की नई उम्मीदें जगाई हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने बस स्टैंड परिसर के आसपास पिछले तीन दशकों से कारोबार कर रहे दर्जनों छोटे दुकानदारों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। प्रशासन द्वारा जारी नोटिसों के बाद प्रभावित परिवारों में चिंता और अनिश्चितता का माहौल है।
करीब 30 वर्षों से चाय, नाश्ते, स्टेशनरी, जनरल स्टोर और अन्य छोटे कारोबारों के सहारे अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे दुकानदार अब भविष्य को लेकर परेशान हैं। उनका कहना है कि इन दुकानों से न केवल उनकी आजीविका चलती है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और परिवार की अन्य जरूरतें भी पूरी होती हैं।
इसी चिंता को लेकर दुकानदारों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से मिला और अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि विकास कार्यों का वे स्वागत करते हैं, लेकिन विकास की कीमत उनके परिवारों का उजड़ना नहीं होनी चाहिए। दुकानदारों ने मांग उठाई कि नए बस अड्डे अथवा प्रस्तावित सिटी सेंटर में उन्हें प्राथमिकता के आधार पर स्थान दिया जाए या फिर पुनर्वास के लिए वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
दुकानदारों का कहना है कि यदि बिना पुनर्वास योजना के उन्हें हटाया गया तो कई परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा। उनका तर्क है कि वर्षों से शहर की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा रहे इन छोटे कारोबारियों की अनदेखी करना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
वहीं, शहर में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोगों का मानना है कि आधुनिक विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाना सरकार और प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी है। अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या विकास की इस नई तस्वीर में उन परिवारों के लिए भी जगह होगी, जिन्होंने वर्षों तक बस स्टैंड क्षेत्र को जीवंत बनाए रखा।
फिलहाल सवाल यही है— क्या सिटी सेंटर की चमक के बीच उन परिवारों की रोज़ी-रोटी बच पाएगी, जिनकी जिंदगी पिछले 30 साल से बस स्टैंड की इन छोटी दुकानों से जुड़ी हुई है?
